मंगलवार, 27 अगस्त 2013

मुहावरे व लोकक्तियाँ - गढ़वाली व कुमाऊँनी मे[ भाग 3 ]



अध्याय १९ मुहावरे व लोकक्तियाँ - भाग ३


गढ़वाली व कुमाऊँनी मे बहुत सी है यहाँ तीसरे भाग मे भी १० -१० मुहावरे व लोकक्तियों को बताया जा रहा है - हिन्दी अर्थ या भावार्थ के साथ [ इससे पहले के भाग १ को इस लिंक मे देखिये http://uttarakhandiwords.blogspot.com/2012/10/blog-post_29.html]  व् भाग २ [http://uttarakhandiwords.blogspot.com/2012/11/blog-post.html]

गढवाली 


२१. घी ख्त्यो बोड्यु मा। 
घी गिरा पर बर्तन में।
[भावार्थ- हानि जैसा होने पर भी हानि ना होना]

२२. जुवों कि डारा घाघरू नि छोड़ेन्दो।  
जुवों कि डर से घाघरा नहीं छौड़ा जाता।
[भावार्थ- सभी कुछ अनुकूल नहीं होता, कुछ प्रतिकूल होने पर भी त्याग नहीं किया जाता]

२३. कितुला कु नाग अर बिरला को बाघ। 
केंचुवे को नाग और बिल्ली को बाघ।
[भावार्थ- भारी भरम हो जाना]

२४. नाक-कटी हाथ मा धरयुंच।
नाक काट के हाथ में रखा हुवा है।
[भावार्थ- मान-सम्मान ताक पर रखकर बेशर्म हो जाना]

२५. पैले बूड गितांग छै अब नाती जि होयुंच।  
पहले से बूढ़ा गायाकर था अब पोता जो हो रखा है।
[भावार्थ- विशेष खुशी प्राप्त होने पर अति उत्साह प्रदर्शित करना]

२६. ढूगा मा धैर्याल।  
पत्थर में रख दिया।
[भावार्थ- त्याग देना]

२७. तातो दूध न घुटेन्द न थूकेंन्द.  
गर्म दूध न पिया जाता न थूका जाता।
[भावार्थ- असमंजस में या अस्थिर रहना]

२८. घुन्डू घुन्डू फुकेगे, कुतराण अब आयी।  
घुटनों तक जल गया बदबू अब आयी।
[भावार्थ- नितांत लापरवाह होना]

२९. भ्वीं मा खुटो नि धरेन्दा।  
जमीन पर पांव नहीं रखा जाता।
[भावार्थ - अत्यंत हर्षित होना]

३०. जाण न पछ्याँण, भक्क अग्वाड़। 
जान न पहचान सीधे गले मिलना।
[भावार्थ - बिना सोचे समझे किसी से अधिक परिचय नहीं बढ़ाना चाहिए]


कुमाऊँनी 

२१. बाण बाणणे बल्द हराण.
[भावार्थ- देखते देखते मौका निकल जाना]

२२. बुड़ो कई बाल नि मानौ बुड़ो कई लाख।
[भावार्थ- अनुभव बहुत महत्वपूर्ण होता है।]

२३. दूधयाल गोरुक लात लै सौनी।
दुधारू गाय की लात भी भली
[भावार्थ- गुणवान व्यक्ति के गुस्से को भी सहन कर लेना चाहिए।]

२४. गाय न बाच्छी नीने अच्छी।
गाय और बछिया नही तो नींद अच्छी
[भावार्थ- अर्थात करने के लिए कोई काम न हो उसे सोते रहना ही अच्छा लगता है।]

२५. सासूल बुआरी थें कौ, बुआरिल नौकर थें कौ, नौकरल कुकुर थें कौ , और कुकुरल पुछड़ हिले दे।
सास ने बहू से कहा, बहू ने नौकर से, नौकर ने कुत्ते से कहा और कुत्ते ने खाली पूंछ हिला दी
[भावार्थ- अर्थात जून तक नहीं रेंगी, काम कुछ भी नहीं हुआ।]

२६. सास थें कुन ब्वारीस सुणुन।
सास के माध्यम से बहू को सुनाना
[भावार्थ- किसी के माध्यम से किसी की चुगली करना।]

२७. अति बिरालु मूस न मरण। 
अधिक बिल्लियाँ चूहा नही मार सकती
[भावार्थ- बहुत अधिक व्यक्ति हों तो काम नहीं हो पाता।]

२८. कै बखत खिमू कड़कड़, कै बखत खिमूलि कड़कड़ि।
कभी पति नाराज तो कभी पत्नी
[भावार्थ-  दंपति में हर समय मनमुटाव रहना।]

२९. आलसी एकै घांत।
[भावार्थ- आलसी व्यक्ति एक बार में ही सारे काम निपटा लेना चाहता है।]

३०. कुआँ क भेकान कुआमें राय।
कुएं के मेढक कुएं में ही रहते हैं
[भावार्थ- सीमित दायरे में रहना]


सहयोगकर्ता - महेंद्र सिंह राणा / रामचंद्र पन्त / हिमांशु करगेती 

उत्तराखंड की भाषा आप ते अपना संस्कृति क दगड़ जुडदी!

3 टिप्‍पणियां:

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  2. तुमहरा भोत भोत धन्यवाद। मेरी दादी सुनौंदि छै मुहावरा- बल कैन इन बोल छौ, कैन उन बोली छौ" त आज आपण भी बोल्याली। धन्यवाद जी
    "पूजा बहुगुणा भण्डारी" (फेसबुक पर) य नाम स छौं

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  3. पूजा जी नमस्कार ! आप फेसबुक में भी जुड़िये ... 'मी उत्तराखंडी छौ' पन्ने पर

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आपक/तुमक बौत बौत धन्यवाद प्रतिक्रिया दीण कुण/लिजी

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